generated image (12)

I’M “WHIMSICAL”

S LIONRAJA FILM STUDIO

Dec 12, 2025 Authur by I

generated image (15)

I’M “WHIMSICAL”I’M NOT OR YES

generated image 2026 01 06t162612.632

पुराने शहर की रात थी सड़कों पर पीली लाइटों की झिलमिलाहट, दूर किसी चाय वाले के स्टील के गिलासों की खनक, और छतों पर फैली हल्की-सी धुंध – सब मिलकर ऐसा माहौल बना रहे थे जैसे शहर खुद किसी राज़ को छुपा रहा हो,इसी शहर की एक पुरानी इमारत की छत पर, आधी टूटी चारपाई पर बैठा था आरव – 28 साल का, एक संघर्षरत लेखक,उसके सामने फटे हुए कागज़ थे, अधूरी कहानियाँ, और बीच में रखी एक पुरानी गोल घड़ी, जिसकी सुइयाँ हर रात ठीक 12:07 पर आकर रुक जाती थीं,

आज भी वही हुआ,घड़ी ने 12 बजाए, शहर की दूर की मस्जिद और मंदिर की आवाज़ें एक साथ गूंजीं, और सात मिनट बाद घड़ी की सुई जैसे थककर रुक गई12:07आरव ने आसमान की तरफ देखा,एक सितारा बाकी सितारों से कुछ ज्यादा चमक रहा था जैसे उसे कोई इशारा कर रहा हो,
आरव के मन में वही पुराना सवाल उठा, जो पिछले कई सालों से उसे चैन नहीं लेने देता था,

“मैं आखिर हूँ कौन?
दूसरों की कहानियाँ लिखने वाला
या अपनी कहानी से भागने वाला?”

वह खुद से बुदबुदाया, मेरी किस्मत क्या है जो इस शहर ने मेरे लिए तय कर दी है, या जो मैं हर रात इन पन्नों पर लिखता हूँ और कभी पूरा ही नहीं कर पाता,

तभी पीछे से एक हल्की-सी आवाज़ आई, जैसे हवा ने शब्दों का रूप ले लिया हो,

“अगर अपनी जिंदगी को तुम खुद लिख सकते
तो सबसे पहले क्या बदलते?”

आरव चौंककर पलटा,छत के किनारे, आधे अंधेरे में एक लड़की खड़ी थी साया धुंधले पीले आसमान की रोशनी उसके चारों तरफ अजीब-सा प्रभामंडल बना रही थी,वो ऐसी लग रही थी जैसे कोई पुरानी याद अचानक आँखों के सामने आ जाए ,जानी-पहचानी भी, और अनजानी भी तुम यहाँ कैसे आई ये दरवाज़ा तो मैंने अंदर से बंद किया थाआरव ने हड़बड़ाकर पूछा,

लड़की ने मुस्कुराकर कहा,

“शायद कुछ दरवाज़े चाबी से नहीं, सवालों से खुलते हैं”

आरव के पास कोई जवाब नहीं था
वह सिर्फ देखता रहा


दिन का चेहरा, रात का सवाल

दिन में आरव एक छोटे से लोकल अखबार के लिए कॉलम लिखता था कॉलम का नाम था “लोगों की कहानियाँ”वह रोज़ शहर भर में घूम-घूमकर लोगों से बात करता,

कोई लड़का जो इंजीनियर बनना चाहता था पर अब पिता की दुकान संभाल रहा था कोई लड़की जिसे पेंटिंग से प्यार था पर उसने अपनी ब्रश रसोई के बर्तन के पीछे छिपा दी थी कोई बूढ़ा आदमी जो कहता था मेरी जिंदगी तो बस दूसरों के फैसलों का जमा-खर्चा है आरव उनकी आवाज़ों को शब्द देता, उनके दर्द को मुलायम बना देता, ताकि अखबार में पढ़ने वालों को लगे “हां, ये तो हमारी ही तरह की कहानी है लेकिन हर बार, किसी और की अधूरी कहानी लिखते-लिखते उसकी अपनी अधूरी कहानी और भारी लगने लगती,

रात को वही पुरानी छत, वही घड़ी, और अब वही रहस्यमयी लड़की,


साया से पहली पूरी बातचीत

अगली रात भी घड़ी 12:07 पर रुक गई,हवा में वही हल्की-सी ठंडक घुली, और कुछ ही पल बाद, साया छत के कोने पर बैठी दिखी – जैसे वह पिछले हज़ारों सालों से वहीं बैठती आ रही हो,आरव ने हिम्मत करके पूछा,
“तुम हो कौन?”

साया ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा,

“मैं तुम्हारी जिंदगी का वो हिस्सा हूँ
जो तुमने कभी पूरी तरह जीने की कोशिश ही नहीं की”

आरव ने बात टालने के अंदाज़ में पूछा,
मतलब काल्पनिक हो सपने वाली तरह वह हँसी,

“अगर सपने नहीं होते, तो तुम अभी यहाँ बैठे भी नहीं होते,
और अगर मैं सिर्फ काल्पनिक होती
तो तुम्हारे सवाल इतने असली क्यों लगते?”

वो हर रात आती, और एक नया सवाल छोड़ जाती

अगर तुम्हारी किस्मत सिर्फ एक बहाना है तो असली डर क्या है तुम जो फैसले नहीं लेते, क्या वो भी तुम्हारी पहचान का हिस्सा नहीं बन जाते,आरव जितना उसे नजरअंदाज करना चाहता, उतना ही उसके शब्द उसके भीतर उतरते जाते,


पुरानी पहचान में दरार

एक सुबह खबर आई कि वह छोटा अखबार, जिसके लिए वह लिखता था फंड की कमी के कारण बंद हो रहा है कुछ ही घंटों में उसका पूरा “सेट” उसकी दिनचर्या उसकी पहचान, उसका मैं पत्रकार हूँ वाला अहंकार – सब टूट गया,घर लौटते वक्त शहर उसे बदला-बदला-सा लग रहा था
जहाँ वह रोज़ लोगों से उनकी कहानियाँ सुनता था आज हर चेहरा उससे कुछ पूछता हुआ लग रहा था

कमरे में पहुँचकर उसने दीवार पर लगी आईने के सामने खुद को देखा,पर आज आईना वैसा नहीं था जैसे हर रोज़ था आईने में उसका चेहरा तो वैसा ही था लेकिन पीछे की दुनिया बदल चुकी थी उसे दिखने लगे,

छोटा आरव, जो छत पर बैठकर कॉपी में कहानियाँ लिखता था पर हर बार पिता की डाँट से पन्ने फाड़ देता था जवान आरव, जिसने शहर छोड़कर बड़े शहर जाने का सपना देखा था, पर मां की आँखों के डर से टिकट कभी नहीं खरीदा एक मुस्कुराता, बेफिक्र आरव, जो दोस्तों के साथ हँसता था, पर धीरे-धीरे जिम्मेदार बनने के चक्कर में गायब हो गया,आईना जैसे कह रहा था

“तुम खुद से कब मिलोगे?”

घबराकर आरव चिल्लाया,मैंने क्या चुना है? सब कुछ मेरे लिए चुना गया है पिता ने, हालात ने, शहर ने मैंने क्या चुना और तभी, कमरे की घड़ी ने 12:07 की आवाज़ की जबकि बाहर दिन था समय जैसे अचानक रुक गया,


साया की असलियत की झलक

उस शाम छत पर साया कुछ अलग थी
आज उसकी आँखों में भी थकान थी, जैसे वह खुद भी किसी भारी सच को ढो रही हो,

आरव ने इस बार सीधे पूछा,सच-सच बताओ, तुम हो कौन हर रात क्यों आती हो,मेरे सवालों से ज्यादा तुम्हें मेरे जवाबों की चिंता क्यों रहती है साया ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,

“मैं तुम्हारी वो ज़िंदगी हूँ
जो तुम जी नहीं पाए,
मैं तुम्हारी वो विकल्प हूँ
जो तुमने कभी चुनी ही नहीं”

हवा जैसे कुछ पल के लिए थम गई

आरव के भीतर कुछ टूटने और जुड़ने लगा,उसे लगा जैसे उसके सामने खड़ी यह लड़की, दरअसल उसकी संभव ज़िंदगी है वो संस्करण जो हर मोड़ पर अलग फैसला लेती, अलग रास्ता चुनती, अलग इंसान बनती,साया ने आगे कहा,

“जब तुमने बचपन में पहली कहानी लिखी थी
और उसे फाड़ दिया था
तब मैं एक हल्की-सी रेखा बनकर
तुम्हारी नोटबुक के किनारे चिपक गई थी,

जब तुमने अपने पहले प्यार को कहा था
‘अभी समय नहीं है, आजीविका पहले है’
तब मैं तुम्हारी आवाज़ से अलग होकर
हवा में तैरने लगी थी

और हर उस रात
जब तुमने अपने ही दिल की बात को व्यावहारिक बोलकर दबा दिया,
मैं तुम्हारे बाहर थोड़ी और असली हो गई”

आरव के होंठ सूख गए ये जादू था वहम था सपना था या सच्चाई पर जो भी था भीतर कहीं बहुत गहरे जाकर चुभ रहा था और शायद वहीं से राहत भी दे रहा था,


“मैं वो हूँ जो हूँ, या जो हो सकता था?”

अब उसकी रातें सिर्फ अजीब नहीं रहीं, खुल कर दर्दनाक और सच होने लगीं,
साया उसे एक-एक करके वे सारे मोड़ दिखाने लगी, जहाँ उसने अपने असली “मैं” से धोखा किया था एक दोस्त जिसे उसने सिर्फ इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वह “समाज में अच्छा प्रभाव जमाना” नहीं देता था एक मौका जब कोई छोटा प्रकाशक उसकी कहानियाँ छापने को तैयार था पर उसने स्थिर नौकरी के चक्कर में मना कर दिया,वो शाम जब उसके पिता ने कहा था ज़िंदगी में व्यावहारिक बनना पड़ता है बेटा, सपनों से पेट नहीं भरता,

आरव की आँखों के सामने उसकी पूरी जिंदगी जैसे दो हिस्सों में बंट गई,

वह जिंदगी जो उसने जी है समझौता, डर, जिम्मेदारियों के नाम पर खुद से भागना वह जिंदगी जो वह जी सकता था जोखिम सच, प्यार, अपने रास्ते की जिम्मेदारी उसके मन में लगातार तीन सवाल गूंजने लगे,

  • मैं कौन हूँ?
  • मेरी किस्मत क्या है?
  • जो मैं चुन रहा हूँ, वही मैं हूँ, या मेरे अंदर बैठा डर चुन रहा है”

जब आरव उन पन्नों को पढ़ता है उसके चेहरे पर जो भाव आते हैं वो सीधे दर्शक के दिल पर उतरते हैं क्योंकि हर इंसान के पास ऐसी ही कोई ना कोई अधूरी “आंतरिक डायरी”होती है,जिसे उसने सिर्फ इसलिए नहीं पढ़ा क्योंकि अंदर जो लिखा है वो बहुत सच है,


बड़ा मोड़,जब किस्मत और पसंद आमने-सामने आ जाते हैं

कहानी के दूसरे हिस्से में, जब उसकी नौकरी जा चुकी है पैसे कम हैं और घरवालों की चिंता बढ़ रही है तभी उसे दो रास्ते मिलते हैं,

  1. एक सुरक्षित, साधारण-सी नौकरी
    एक ऑफिस, नियमित सैलरी,
    समय निश्चित करो, और एक ऐसा जीवन जो “ठीक-ठाक” कहा जा सकता है,
  2. एक जोखिम भरा मौका,
    एक छोटा प्रकाशक चाहता है कि वह अपनी खुद की किताब लिखे,
    अपने नाम से, अपनी असली कहानी पर
    पैसे की कोई गारंटी नहीं,
    सफलता की कोई
    गारंटी नहीं – सिर्फ सच लिखने का मौका,

घर वाले, दोस्त,
व्यावहारिक लोग – सब पहले रास्ते की तरफ धकेलते हैं
साया चुपचाप दूसरे रास्ते की तरफ देखती रहती है,

घड़ी फिर 12:07 पर रुकती है
इस बार समय का रुकना “जादू” से ज्यादा “फैसले” जैसा लगता है,


घड़ी तोड़ने का पल

छत पर हवा कुछ ज्यादा तेज़ चल रही है आसमान में बादल हैं, पर एक कोने से सितारों की हल्की झलक दिखती है आरव घड़ी को हाथ में उठाए खड़ा है उसके सामने जिंदगी के दोनों रास्ते जैसे दो दरवाज़ों की तरह दिखते हैं साया धीरे से कहती है,

“आज मैं आखिरी बार आई हूँ, आरव
या तो तुम मुझे अपनी जिंदगी में जगह दोगे ,
यानी वो ज़िंदगी चुनोगे जो सच में तुम्हारी है,
या फिर मैं हमेशा के लिए सिर्फ
‘क्या होता अगर?’ बनकर रह जाऊँगी”

आरव के भीतर पुरानी पहचान चीखती है

सुरक्षित रहो, व्यावहारिक बनो, रिस्क मत लो”नई पहचान फुसफुसाती है एक बार सिर्फ एक बार, खुद को चुनकर देखो”उसकी आँखों में सारी रातें, सारी कहानियाँ, सारे “अधूरे मैं” एक साथ तैरने लगते हैं,

वह धीमे-धीमे घड़ी को देखता है वही घड़ी जो सालों से 12:07 पर रुक जाती थी जैसे किसी अदृश्य डर ने उसके समय को जकड़ रखा हो,एक गहरी सांस लेकर वह घड़ी को उठाता है और पूरी ताकत से दीवार पर दे मारता है घड़ी के टूटने की आवाज़ पूरे कमरे में गूंजती है कांच के टुकड़े उड़ते हैं धातु का ढांचा अलग हो जाता है और दीवार पर सिर्फ एक हल्का-सा निशान रह जाता है जैसे समय ने अपनी पकड़ ढीली कर दी हो,

आसमान में वही सितारा तेज़ चमकता है फिर धीरे-धीरे फीका हो जाता है मानो कोई वैकल्पिक ज़िंदगी वो जो कभी जिया ही नहीं गया ,मुस्कुराकर अलविदा कह रही हो,

साया की आँखों में चमक और नमी दोनों हैं,

“अब मैं तुम्हारे बाहर नहीं, तुम्हारे अंदर रहूँगी,
आरव
हर बार जब तुम सच में अपने लिए
कोई फैसला लोगे
मुझे यहीं पाओगे”

उसके शब्द हवा में घुलते हैं
धीरे-धीरे उसका चेहरा धुंध बनकर आसमान में मिल जाता है
जैसे धूप में पुरानी परछांई खो जाती है


नया “मैं” किताब का जन्म

कुछ समय बाद,एक छोटा-सा कमरा, एक सादा-सी मेज़,उस पर रखी एक पुरानी,टाइपराइटर या लैपटॉप और उसके सामने बैठा आरव वह अपनी पहली किताब लिख रहा है किताब का नाम है,

“WHIMSICAL – मैं कौन हूँ?”

उसकी उंगलियाँ कीबोर्ड पर चलती हैं पर उसे लगता है जैसे वह पहली बार अपनी जिंदगी पर खुद कलम चला रहा हो,वॉइसओवर जो फिल्म में गूंजता है कहता है,

“शायद किस्मत कहीं बाहर नहीं लिखी जाती
शायद वो हर उस पल में लिखी जाती है
जब हम डर के बजाय सच चुनते हैं
जब हम सिर्फ ‘अच्छा बेटा’,
‘अच्छी बेटी’,
‘अच्छा इंसान’
बनने के दबाव से बाहर आकर
बस ‘सच्चा खुद’ बनने की जिद करते हैं”


हर चेहरे की आँखों में एक-सा हल्का-सा खालीपन और चमक दोनों हैं
जैसे हर कोई अपने स्तर पर ये सोच रहा हो,

“मैं जो हूँ
क्या ये सच में मैं हूँ?
या बस वो
संस्करण हूँ
जो दुनिया ने मेरे लिए चुन दिया?”

स्क्रीन पर आरव की किताब का ढकना धीरे से सामने आता है उस पर लिखा है,

“WHIMSICAL – मैं कौन हूँ?”
लेखक: आरव

और दूर से एक हल्की-सी आवाज़ आती है
साया की, या शायद हर दर्शक के अपने अंदर की आवाज़,

“सवाल आसान नहीं है
पर जवाब
तुम्हारे हर फैसले में छुपा है”.

कृपया ध्यान दें:

जो मूल फिल्म स्क्रिप्ट होगी बो अलग हो सकती है ये कहानी केवल उदाहरण के लिए है.

कोई और कहानी पढ़ें


Comments

One response to “I’M “WHIMSICAL””

  1. […] कोई और कहानी पढ़ें […]

Leave a Reply to mashoor,love – slionraja.in Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *